Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 34, Verses 97–98
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 34, verses 97–98 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 34 · श्लोक 97,98
संस्कृत श्लोक
त्यक्तसंकल्पकलया सूक्ष्मया चिद्व्यवस्थया ।
सर्वभावानुगतया सत्ताद्वैतैकरूपया ॥ ९७ ॥
विचित्रापि पदार्थश्रीरन्योन्यवलितान्तरा ।
तुल्यकालानुभवना साम्येनैवानुभूयते ॥ ९८ ॥
हिन्दी अर्थ
घट, पट आदि विचित्र पदार्थ शोभा भी अन्योन्य के व्यावर्तक भेद संकल्पकला का
त्याग की हुई, सूक्ष्म, सर्वगत, एकमात्र सत्ता अद्वैतरूप चिद्व्यवस्था एक ही समय में अनुभूयमान
होती हुई समता से अनुभूत होती है विषमता से नहीं यानी विषयआदि का भेद चित् का भेदक नहीं
है, यह दोनों का अर्थ है