Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verses 20–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 35, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 20,21

संस्कृत श्लोक

एष जागर्ति सुप्तानां प्रहरत्यविवेकिनाम् । हरत्यापदमार्तानां वितरत्यमहात्मनाम् ॥ २० ॥ विचरत्येष लोकेषु जीव एव जगत्स्थितौ । विलसत्येव भोगेषु प्रस्फुरत्येव वस्तुषु ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

एव सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।* इस श्रुति का अवलम्बन करके कहते है । सोये हुए लोगों के बीच में यह जाग्रत्‌ रहता है, अविवेकियों के ऊपर प्रहार करता है, दुःखियों की आपत्ति दूर करता है और जो महात्मा नहीं हैं, उनको मनोवांछित देता है । जगत्‌ स्थिति में यह आत्मा ही जीव होकर लोकों में विचरण करता है, भोगों मे विलास करता है ओर वस्त्र, आभूषण, समान, उत्सव आदि वस्तुओं में शोभित होता हे