Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 35, Verses 67–68

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 35, verses 67–68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 67,68

संस्कृत श्लोक

शान्तेन्द्रियोग्रग्राहाय क्षीणचित्तौर्ववह्नये । आनन्दाम्बुधये तुभ्यं मह्यमात्मन्नमो नमः ॥ ६७ ॥ गताहंकारमेघाय शान्ताशादाववह्नये । मह्यमानन्दशैलाय विभ्रान्ताय नमो नमः ॥ ६८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे आत्मन्‌, जिसके इन्द्रियरूपी भयंकर मगर शान्त हो गये हैं, जिसका चित्तरूपी बड़वानल नष्ट हो गया ऐसे आनन्द के सागर प्रत्यगात्मरूप तुमको (ब्रह्म) बारबार नमस्कार है। जिससे अहंकाररूप मेघ चला गया है और आशारूपी वनाग्नि जिसमें शान्त हो चुकी ऐसे निश्चल आनन्द पर्वतरूप प्रत्यगात्म ब्रह्म को पुनः पुन: नमस्कार हे