Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 4–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 36, verses 4–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 4-7
संस्कृत श्लोक
स्वसत्तापूरिताशेषविश्व विश्वजनीन भोः ।
सर्वत्र लक्ष्यसे नित्यमधुना क्व पलायसे ॥ ४ ॥
आवयोरन्तरं भूरि जन्मव्यवहितान्तरम् ।
अदूरमद्य संपन्नं दिष्ट्या दृष्टोऽसि बान्धव ॥ ५ ॥
नमस्ते कृतकृत्याय कर्त्रे भर्त्रे नमोस्तु ते ।
नमः संसारवृन्ताय नित्याय विमलात्मने ॥ ६ ॥
नमश्चक्राजहस्ताय नमश्चन्द्रार्धधारिणे ।
नमो विबुधनाथाय नमस्ते पद्मजन्मने ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे विश्वजनीन, आपने अपनी सत्ता से सकल विश्व को भर रक्खा है, अतः नित्य सब जगह आप
दिखाई देते हैं। अब इस समय आप कहाँ भागते हो ? हम दोनों का बहुत से जन्मों से व्यवहित अज्ञान
व्यवधायक था। आज उसका नाश होने से अत्यन्त अभेदरूप समीपता पैदा हो गई है। हे बान्धव, बड़े
भाग्य से मैं आपको देख पाया हूँ। आप कृतकत्य हैं, कर्ता हैं, सबका भरणपोषण करनेवाले हैं, आपको
बारंबार नमस्कार है। आप संसाररूपी पत्ते के वृन्तरूप, नित्य और निर्मल हैं, आपको नमस्कार है।
हाथ में चक्र और कमल धारण करनेवाले (विष्णुरूप) आपको नमस्कार है। अर्धचन्द्र धारण करनेवाले
शिवरूप आपको नमस्कार है । देवताओं के अधिपति (इन्द्ररूप) आपको नमस्कार है । कमलयोनि
(ब्रह्मारूप) आपको नमस्कार है