Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 36, Verses 62–67
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 36, verses 62–67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 62-67
संस्कृत श्लोक
सदपीह न सत्तायै वस्तु नावर्जितं त्वया ।
तृप्तये न स्वलावण्यं मुकुरात्प्रतिबिम्बितम् ॥ ६२ ॥
लुठति त्वां विना देहः काष्ठलोष्टसमः क्षितौ ।
सन्नप्यसन्नगोच्छ्रायः श्यामास्विव रविं विना ॥ ६३ ॥
सुखदुःखक्रमः प्राप्य भवन्तं परिनश्यति ।
प्राकाश्यमासाद्य यथा तमस्तेजोऽथवा हिमम् ॥ ६४ ॥
त्वदालोकनयैवैते स्थितिं यान्ति सुखादय ।
सूर्यालोकनया प्रातर्वर्णाः शुक्लादयो यथा ॥ ६५ ॥
लब्धात्मानो विनश्यन्ति संबन्धक्षण एव ते ।
ते तमांसीव दीपस्य दृष्टा एव व्रजन्त्यलम् ॥ ६६ ॥
तमस्ता तमसो दीपासत्तायां स्फुटतां गता ।
दीपसंबन्धसमये सा चोत्पद्य विनश्यति ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे दर्पण आदि में प्रतिबिम्बित अपने मुख का
सौन्दर्य कान्ताओं के चुम्बन आदि अर्थक्रिया प्रयुक्त तृप्ति के लिए पर्याप्त नहीं होता, वैसे ही वस्तुभूत
आपसे रहित विद्यमान भी पदार्थ अर्थ क्रिया के लिए समर्थ नहीं होता। जैसे अन्धेरी रात में सूर्य के बिना
वृक्ष, पर्वत आदि की ऊँचाई विद्यमान होती हुई भी भान न होने के कारण असत्प्राय रहती है वैसे ही
आपके विना काष्ठ लोष्ठ के तुल्य यह शरीर पृथिवी पर पड़ा रहता है। जैसे सूर्य के प्रकाश को पाकर
अन्धकार नष्ट हो जाता है अथवा जैसे सूर्य के तेज को पाकर हिम नष्ट हो जाता है वैसे ही आपको
प्राप्त कर यह सुख-दु:ख क्रम नष्ट हो जाता हे जैसे प्रातःकाल में सूर्य के आलोकन से शुक्ल आदि
वर्ण स्थिति को प्राप्त होते हैं वैसे ही आपके आलोकन से ही ये सुख आदि स्थिति को प्राप्त होते हैं।
चूँकि आपके आलोकन से ही उत्पन्न हुए वे सुख आदि चरमसाक्षात्कार से दीप्त हुए आपके सम्बन्ध
समय में ही नष्ट हो जाते हैं, परन्तु आपके द्वारा देखे गये ही वे दूर होते हैं अन्य उपाय से नहीं । दीपक
के अभाव में स्फुटता को प्राप्त हुई अन्धकार की अन्धकारता दीपक के प्रकाश के सम्बन्ध के समय
अपने धर्मी से वियुक्त होकर नष्ट हो जाती है । उसका धर्म तो सन्मात्रस्वभाव है, जो नष्ट नहीं
होता