Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 39, Verses 31–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 39, verses 31–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
धरासाररणच्छैलाः प्रज्वलज्ज्वलनोज्ज्वलाः ।
ककुभो न विशीर्यन्ते तनुं त्यजसि किं मुधा ॥ ३१ ॥
न ब्रह्मविष्णुरुद्राख्यत्रयीशेषमिदं स्थितम् ।
जगज्जरठजीमूतं तनुं त्यजसि किं मुधा ॥ ३२ ॥
न चेहाद्रिदलश्रेणिमात्रैकानुमितान्तराः ।
दिशो जर्जरतां यातास्तनुं त्यजसि किं मुधा ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जल रही भूमि के प्रकम्प से विदीर्ण
होने के कारण जिसमें पर्वत शब्द कर रहे हों और अग्नि के जलने से जो उज्जवल हो ऐसी दिशाएँ
विशीर्णं नहीं हुई हैं, व्यर्थ में तुम शरीर का क्यों त्याग करते हो ?