Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 4, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 4, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
वाक्यार्थश्चाखिलः कच्चित्त्वया राम विचारितः ।
ह्यस्तनस्य विचारस्य रात्रौ हृदि निवेशितः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे सन्मते, फैले हुए अविद्या
के रूप का, जो काल के बल से नष्ट होनेवाला, संख्या से अनन्त और देश, कालादि से अन्तवाला है,
क्या आप स्मरण करते हैं ? चित्त ही नर है, चित्त से अतिरिक्त नर नहीं है, ऐसा जो मैंने कहा था,
उसका लक्षण आदि के विचार द्वारा क्या आप भलीभाँति स्मरण करते हैं 2॥ १९, २० हे श्रीरामचन्द्रजी,
क्या आपने कल के श्रवण के विषयभूत वाक्यार्थ को मनन द्वारा परिष्कृत किया और रात्रि में उसे हृदय
में स्थापित किया ?