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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 40, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 40, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 40 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच । स्थैर्यं देहस्य दृष्टस्य जीवितं प्रोच्यते जनैः । देहान्तरार्थं देहस्य संत्यागो मरणं स्मृतम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि प्रह्माद जीवन्मुक्त था तथापि उसके लिए केवलसंनिधि से राज्यपालन के निर्वाह के उपाय का उपदेश देने की इच्छावाले भगवान्‌ श्री हरि देह के रहते भी उसके साथ सम्बध न रहने से पूर्वोक्त जीवन और मरण गौण ही हैं। मुख्य नहीं है यह कहने के लिए जीवन और मरण के लोकप्रसिद्ध स्वरूप को कहते हैं। दृष्ट देह की स्थिरता को लोग जीवन कहते हैं फिर द्वितीय देह के ग्रहण के लिए पूर्व देह का त्याग (उत्क्रमणपूर्वक गमन) मरण कहा गया है

सर्ग सन्दर्भ

उनतालीसवाँ सर्ग समाप्त चालीसवाँ सर्ग सदेह होता हुआ भी विदेह और कर्मपरायण होता हुआ भी कुटस्थ ज्ञानी जिस क्रम से व्यवहार करे, उस क्रम का प्रतिपादन ।