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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 43, Verses 29–30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 43, verses 29–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 43 · श्लोक 29,30

संस्कृत श्लोक

यस्तु भोः स्थितिमेवास्यामात्मज्ञानचमत्कृतौ । नासादयति संमत्तमनाः स रघुनन्दन ॥ २९ ॥ अप्राप्तात्मविवेकोऽन्तरज्ञचित्तवशीकृतः । शंखचक्रगदापाणिमर्चयेत्परमेश्वरम् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

तब बाह्य विष्णु भक्ति का अधिकारी कौन है ? ऐसा प्रश्न होने पर उसे कहते हैं। हे वत्स रघुनन्दन, जो उन्मत्त मनवाला पुरुष आत्मज्ञान के चमत्कार में कदापि स्थिति को प्राप्त होता ही नहीं, आत्मविवेकलाभ से शून्य और अन्तगर्त अज्ञ मन का वशीभूत हो वह शंख-चक्र- गदाधारी परमेश्वर की पूजा करे