Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 45, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
मणिरत्नकृतागारं तत्र मङ्गलहस्तिनम् ।
ददर्शामरशैलेन्द्रमिव संचारचञ्चलम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर उसने चलने से चंचल हुऐ सुमेरु पर्वत
के, जिसमें श्रेष्ठ मणियों से देवताओं के मन्दिर बने थे, तुल्य श्रेष्ठ रत्नों के झूले से अलंकृत मंगल हाथी
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