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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, Verses 37–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 45, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

तुषारशिशिरस्पर्शैस्तास्तं हारैरभूषयन् । श्यामा वननदीपूरैर्वर्षाः श्रृङ्गमिवोत्तमम् ॥ ३७ ॥ विचित्रवर्णसौगन्ध्यैः पुष्पैरावलयन्स्त्रियः । वनं मधुश्रिय इव तं लोलकरपल्लवाः ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे वृष्टियाँ जल प्रवाहो से वन मध्य में स्थित उत्तम शिखर को विभूषित करती हे वैसे ही हिम के समान शीतल स्पर्श वाले हारों से उन युवतियों ने उसे विभूषित किया