Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 45, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 45, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
हरिहतकरिकुम्भोन्मुक्तमुक्ताकलापप्रविरचितशरीरः शान्तचिन्ताविषादः ।
अरमत सह सद्भिस्तत्र भोगैः सरस्यां रविकरमदतप्तो वारिपूरैरिवेभः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
सन्तप्त हुआ हाथी जल के प्रवाहों से क्रीडा करता है वैसे ही सिंहों से विदीर्ण किये गये हाथियों के कुम्भों
से गिरे हुए मोतियों से विभूषित शरीरवाला और चिन्ता एवं विषाद से शून्य वह सज्जनों के साथ भोगों
से आनन्द लेता था