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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 46, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 46, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

इति निश्चित्य गवलो ज्वलिते ज्वलने पुनः । पतङ्गवदनुद्वेगमकरोदाहुतिं वपुः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसा विचार कर गवल ने अपने शरीर को पतंग की नाई बिना किसी उद्वेग के प्रज्वलित अग्नि में आहुति बना दिया