Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 48, Verses 3–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 48, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 3 ,4
संस्कृत श्लोक
उवाच स्वात्मनैवेदमरण्ये लुठितालये ।
शुष्कास्थिमालावलिते पिशाचक इव द्रुमे ॥ ३ ॥
इमास्ता मृतमातङ्गदन्तमाला वृतौ कृताः ।
अद्यापि संस्थिताः कल्पं प्रतिमेरुशिखा इव ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
आप कहता हैं, वैसे ही जंगल में खण्डहर मेँ उसने अपने मन में कहा कि परिखा मे खाई में गाड़ी हुई ये
मरे हुए हाथियों के दाँतों की मालाएँ आज भी प्रलयकाल को लक्ष्य करके मेरु की चोटियों के समान
स्थित हैँ