Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 48, Verses 60–61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 48, verses 60–61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
तथैवेदं कटंजस्य प्राक्तनं लुठितं गृहम् ।
जनैरुक्तं कटंजस्य दृष्टवानसि संभ्रमम् ॥ ६० ॥
तथैव कीरनगरं प्राप्तोऽस्मि कथितं च मे ।
कीरैः श्वपचराजत्वं दृष्टवानसि सभ्रमम् ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी प्रकार कटंजनाम के
चाण्डाल का यह नष्ट हुआ प्राक्तन घर है, यों मनुष्यों से कहे गये कटंज के गृहरूप भ्रम को तुमने
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