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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verses 14–15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 14,15

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । पूर्वं राघव शास्त्रेण वैराग्येण परेण च । तथा सज्जनसङ्गेन नीयतां पुण्यतां मनः ॥ १४ ॥ सौजन्योपहितं चेतो यदा वैराग्यमागतम् । तदानुगम्या गुरवो विज्ञानगुरवोऽपि ये ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

पहले शास्त्राभ्यास ओर सज्जनसंगति से वैराग्य आदि साधन चतुष्टय का सम्पादन करना चाहिए, ऐसा कहते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, पहले शास्त्राभ्यास, सज्जनसंग और उत्कृष्ट वैराग्य से मन को ज्ञानोदय के योग्य बनानेवाली विशुद्धि को प्राप्त कीजिए । जब निराभिमानता से युक्त मन वैराग्य को प्राप्त होता है, तब सब शास्त्रों के रहस्यज्ञान से अत्यन्त गौरवशाली और उपदेश देने की कुशलता से शिष्य को सुबुद्ध करने में समर्थ गुरूओं का विधिपूर्वक अनुगमन करना चाहिए