Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
हे जना अपरिज्ञात आत्मा वो दुःखसिद्धये ।
परिज्ञातस्त्वनन्ताय सुखायोपशमाय च ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे जनों, अपरिज्ञात (जिसका परिज्ञान नहीं हुआ) आत्मा आप लोगों की दुःखसिद्धि के लिए हैं,
क्योंकि ““यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरे कुरुते अथ तस्य भयं भवति, तत्त्वेव भयं विदूषो मन्वानस्य“
(जब यह इस आत्मा में थोड़ा भी भेद करता है, तब इसे भय होता है, ज्ञान के अपरिपाकवश उपास्य-
उपासक भाव को देख रहे विद्वान को भी भय होता है) ऐसी श्रुति है । परिज्ञात आत्मा तो अनन्त सुख
ओर शान्ति के लिए है, क्योकि “रसह्येवायं लब्ध्वानन्दीभवति", “सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत्”
“ज्ञात्वा तं मृत्युमत्वेति" “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन" इत्यादि श्रुतियाँ है