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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 5, Verses 27–40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5, verses 27–40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 5 · श्लोक 27-38

संस्कृत श्लोक

जडधर्मि मनो यावद्गर्तकच्छपवत्स्थितम् । भोगमार्गवदामूढं विस्मृतात्मविचारणम् ॥ २७ ॥ तावत्संसारतिमिरं सेन्दुनापि सवह्निना । अर्कद्वादशकेनापि मनागपि न भिद्यते ॥ २८ ॥ संप्रबुद्धे हि मनसि स्वां विवेचयति स्थितिम् । नैशमर्कोदय इव तमो हार्दं पलायते ॥ २९ ॥ नित्यमुत्तमबोधाय योगशय्यागतं मनः । बोधयेद्भवभेदाय भवो ह्यत्यन्तदुःखदः ॥ ३० ॥ यथा रजोभिर्गगनं यथा कमलमम्बुभिः । न लिप्यते हि संश्लिष्टैर्देहैरात्मा तथैव च ॥ ३१ ॥ कर्दमादि यथा हेम्ना श्लिष्टिमेति पृथक्स्थितम् । नान्तःपरिणतिं याति जडो देहस्तथात्मना ॥ ३२ ॥ सुखदुःखानुभावित्वमात्मनीत्यवबुध्यते । असत्यमेव गगने बिन्दुताम्लानते यथा ॥ ३३ ॥ सुखदुःखे न देहस्य सर्वातीतस्य नात्मनः । एते ह्यज्ञानकस्यैव तस्मिन्नष्टे न कस्यचित् ॥ ३४ ॥ न कस्यचित्सुखं किंचिद्दुःखं च नच कस्यचित् । सर्वमात्ममयं शान्तमनन्तं पश्य राघव ॥ ३५ ॥ इमा याः परिदृश्यन्ते वितताः सृष्टिदृष्टयः । पयसीव तरङ्गास्ते पिच्छं व्योम्नीव चात्मनि ॥ ३६ ॥ यथा मणिर्ददात्यात्मच्छायाः स्वयमकारणम् । तेजोमयीस्तथैवायमात्मा सृष्टीः प्रयच्छति ॥ ३७ ॥ आत्मा जगच्च सुमते नैकं न द्वैतमप्यसत् । आभासमात्रमेवेदमित्थं संप्रति जृम्भते ॥ ३८ ॥ समस्तं खल्विदं ब्रह्म सर्वमात्मैवमाततम् । अहमन्यदिदं चान्यदिति भ्रान्तिं त्यजानघ ॥ ३९ ॥ तते ब्रह्मघने नित्ये संभवन्ति न कल्पनाः । विच्छित्तयः पयोराशौ यथा राम न सन्मयाः ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

दुर्वासनारूपी पंकपूर्ण, गर्त में कछुए के समान छिपा हुआ ओर कठोर, भोग प्राप्ति में मार्ग के समान द्वार भी इन्द्रियो द्वारा विषयों मेँ संलग्न, जड मन जब तक स्थित है, जिसने आत्मविचार को भुला दिया है, तब तक इस संसाररूपी अन्धकार का चन्द्रमा, अग्नि, नक्षत्र, मणि आदि सब तेजो के साथ बारहों सूर्य भी तनिक भी भेदन नहीं कर सकते । प्रबुद्ध मन जब अपनी पारमार्थिक स्थिति को असत्यभूत प्रपंच से पृथक्‌ कर देखता है, तब हृदयस्थ अज्ञानान्धकार सूर्य का उदय होने पर रात्रि के अन्धकार के समान निवृत्त हो जाता हे । देहादि तादात्म्य अध्यासरूप शय्या पर शयन किये हुए मन को उत्तम ज्ञान के लिए और संसार की निवृत्ति के लिए नित्य जाग्रत करे, क्योकि संसार अत्यन्त दुःखदायी है । जैसे धूलि से आकाश का सम्बन्ध होने पर भी धूलि से आकाश लिप्त नहीं होता ओर जैसे जल से कमल का सम्बन्ध होने पर भी जल से कमल लिप्त नहीं होता वैसे ही सम्बद्ध हुए शरीरो से आत्मा लिप्त नहीं होता हे । जैसे पृथक्‌ स्थित कीचड़ आदि का सुवर्ण के साथ संसर्ग होता है; किन्तु वह सुवर्णतादात्म्य आपत्तिरूप परिणति को वस्तुतः भीतर प्राप्त नहीं होता है वैसे ही जड शरीर का आत्मा के साथ संसर्ग तो होता है, परन्तु वह आत्मतादात्म्य आपत्तिरूप परिणाम को वस्तुतः प्राप्त नहीं होता है। जैसे आकाश में हजारों विन्दुओं की आकृति ओर मलिनता असत्य ही प्रतीत होती है वैसे ही आत्मा में सुख ओर दुःख की अनुसारिता और अनुभवकर्तृता असत्य ही मूढो को प्रतीत होती है। सुख और दुःख न तो देह के हैं और न सर्वातीत आत्मा के हे । ये अज्ञान के ही हैं, अज्ञान का नाश होने पर किसी के भी नहीं हैँ । न तो किसी का कुछ सुख है ओर न किसी का कुछ दुःख हे । हे श्रीरामचन्द्रजी सबको आप अपनी ज्ञानदृष्टि से अनन्त आत्मा का विवर्तं ओर नित्य प्रशान्त देखिये । जो ये विस्तृत सृष्टिदृष्टियाँ चारों ओर दिखाई देती है, वे जल में तरगों की तरह ओर आकाश में पिच्छक की (४६५) तरह आत्मा में ही हैं। जैसे मणि किसी प्रकार का व्यापार किये बिना अपने आप तेजोमय अपनी कान्तियों को फैलाती है वैसे ही यह आत्मा भी कार्यव्यापार के बिना अपने आप सृष्टियों का प्रसार करता हे । हे सुमते, आत्मा ओर जगत न तो एक (अद्वितीय) हैं और न अनेक ही है, क्योकि जगत का रूप असत्‌ है, भाव यह है कि असत्‌ से सत्‌ का न अभेद कहा जा सकता हे ओर न भेद ही कहा जा सकता हे । अज्ञानकाल में यह इस प्रकार आभासमात्र ही स्फुरित होता हे