Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
चिरं संसरणाकाशकोटरं चित्तकुम्भखम् ।
विनाश्यातुलिताकाशस्वरूपं रूपमाविश ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे घटाकाश में रोका गया मच्छरादि जिसमें दुःखपूर्वक संसरण है ऐसे
आकाश कोटर को भाग्यवश घड़े के विनाश से नष्ट कर, अनुपम महाकाश में प्रवेश कर बन्धन रहित ही
सुखी होता हे वैसे ही आप भी चित्त के नाश से चित्तरूपी घटाकाश का विनाश कर अतुलित ब्रह्माकाश
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