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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

स्वरूपमनुयातस्य तीर्णस्याशामहार्णवम् । प्रसरिष्यति ते संवित्सर्यांशुरिव सर्वतः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने स्वरूप को प्राप्त हुए एवं आशारूपी महासागर को पार किये हुए आपकी बुद्धि सूर्य की किरणों के समान चारो ओर फैलेगी