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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verses 80–81

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 50, verses 80–81 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 80,81

संस्कृत श्लोक

ग्रन्थीकृतं कर्मभिरात्मसृष्टेर्मन्त्रैरभेद्यं ज्वलनैरदग्धम् । पीडां परामात्मनि कल्पयन्तं समस्तजात्यन्तरदीर्घदाम ॥ ८० ॥ संप्रोतनिःसंख्यशरीरमालं बलादसंकल्पनमात्रशस्त्रैः । छित्त्वा स्वयं राघव चित्तपाशं यथासुखं त्वं विहरास्तशङ्कः ॥ ८१ ॥

हिन्दी अर्थ

पुण्य-पाप कर्मो से निरन्तर गाँठ देने से मजबूत बनाये गये, मन्त्रों द्वारा छिन्न-भिन्न नहीं हुए, अग्नि से जलाये न गये, आत्मा में महती पीड़ा की कल्पना करे, अतएव सब विविध योनियों के विविध जन्मों के क्रमशः बन्धन के लिए लम्बी रस्सी के समान स्थित चित्तरूपी जाल को, जिसमें असंख्य शरीर पंक्तियाँ गुँथी गई हैं, असंकल्परूप शस्त्रों से जबरदस्ती काटकर आप स्वयं पुनर्जन्म शंकारहित होकर सुखपूर्वक विहार कीजिये