Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 51, Verses 29–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 51, verses 29–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
कदोपशान्तचित्तात्मा चित्तामुपगतः पराम् ।
परमालोकमेष्यामि जात्यन्धविगमादिव ॥ २९ ॥
कदाभ्यासोपलभ्येन चित्प्रकाशेन चारुणा ।
दूरादालोकयिष्यामि तन्वीं कालकलामिमाम् ॥ ३० ॥
ईहितानीहितैर्मुक्तो हेयोपादेयवर्जितः ।
कदान्तस्तोषमेष्यामि स्वप्रकाशपदे स्थितः ॥ ३१ ॥
कदाशाकौशिकीकीर्णा जाड्यजीर्णहृदम्बुजा ।
क्षयमेष्यति कृष्णेयं कदा मे दोषयामिनी ॥ ३२ ॥
कदोपशान्तमननो धरणीधरकन्दरे ।
समेष्यामि शिलासाम्यं निर्विकल्पसमाधिना ॥ ३३ ॥
कदा मे मानमातङ्गः स्वाभिमानमहामदः ।
सत्त्वावबोधहरिणा हतो नाशमुपैष्यति ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसका चित्त शान्त हो गया है ऐसे स्वरूपवाला अतएव उत्तम
चिदेकरसता को प्राप्त हुआ मैं जन्मान्धता के सदुश अनादि मूलअज्ञान के हटने से कब परम आलोक
को प्राप्त होऊँगा ?