Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
घ्राणमार्गमुपाश्रित्य शरीराम्भोजकोटरे ।
गन्धोन्मुखतया बन्धं मा त्वं संश्रय भृङ्गवत् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
गन्ध के अनुभव की इच्छा से प्राणेन्द्रियता का
आश्रय लेकर हाथी द्वारा मसले गये कमल के अन्दर स्थित भँवरे के समान शरीर रूपी कमल के अन्दर
बन्धन को प्राप्त मत हो