Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
हे चित्त वासनाजालं बन्धाय भवतोहितम् ।
स्वात्मनः सहजः फेनस्ततः कुकृमिणा यथा ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे चित्त, जैसे क्षुद्र रेशम का कीड़ा अपने स्वाभाविक लार के फेन का
अपने बन्धन के लिए कोशरूप से प्रसार करता है वैसे ही तुमने भी वासनाजाल की अपने कुवितर्क से
रचना की हे