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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verses 26–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verses 26–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 26-28

संस्कृत श्लोक

यावदज्ञानघनता तावत्प्रघनचित्तता । यावत्प्रावृड्जलदता तावन्नीहारभूरिता ॥ २६ ॥ यावदज्ञानतनुता तावच्चित्तस्य तानवम् । प्रावृट्परिक्षयो यावत्तावन्नीहारसंक्षयः ॥ २७ ॥ यावत्तानवमायातं शुद्धं चित्तं विचारतः । तावत्तत्क्षीणमेवाहं मन्ये शारदमेघवत् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा चित्त के उच्छेद के लिए पृथक्‌ प्रयत्न करने की भी आवश्यकता नहीं है क्योकि वह मूलअज्ञान के अन्वय व्यतिरेक का अनुसरण करता है यानी मूलअज्ञान के अस्तित्व से उसका अस्तित्व है और मूलअज्ञान के अभाव से उसका अभाव है। अतएव मूलअज्ञान के उच्छेद से ही उसका उच्छेद करना चाहिए, इस आशय से कहते हैं। जब तक निबिड अज्ञान है तब तक घनीभूत चित्त है, जब तक वर्षा ऋतु के मेघ रहेंगे तब तक अवश्य प्रचुर कुहरा रहेगा । जितना अज्ञान क्षीण होता जायेगा उतना ही चित्त भी कृश होता जायेगा । जितना वर्षा ऋतु का विनाश होगा उतना ही कुहरा क्षीण होगा । विचार से शुद्ध हुआ चित्त वासनाक्षय से जितनी सूक्ष्मता को प्राप्त हुआ (शरत्काल के मेव की तरह) मैं उसको उतना क्षीण हुआ भी समझता हूँ