Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
वेद तत्त्वां स्वसंवेद्यमाततं दुःखकारणम् ।
विवेकजेन बोधेन तदिदं हन्यसे मया ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि अहंपदार्थ है ही नहीं, तो तुम कौन हो ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते है।
तीनों जगता में जिसने सब दिशारूपी कुंजों को भर रक्खा है यानी जो दिशाकृत परिच्छेद से रहित
है, एक यानी वस्तुकृत परिच्छेद से रहित है, ज्ञेय क्रम से भूत, वर्तमान ओर भविष्यत् तीन अवस्थारूप
काल से किये गये परिच्छेद से शून्य है, अतएव सब प्रकारो में वस्तु अवान्तर स्वरूपशून्य है इस प्रकार
का ज्ञानरूप ही मैं हूँ ॥ ३ ७॥ जिसका परिच्छिन्न रूप नहीं है, जिसकी नाम की कल्पना नहीं है, एकत्व
संख्या नहीं है, न जिसकी अन्यता है, न महत्ता है और न अणुता हे, वह ज्ञानरूप मैं हूँ ॥३ ८॥ हे चित्त,
चूँकि मैं ज्ञानस्वरूप हूँ, इसलिए साक्षीभूत अपने ज्ञेय दुःखकारण तुमको, जो चारों ओर फैले हो,
देखता हूँ। दुःख के कारण होने से ही तुम आगे कहे जानेवाले विवेक का उपार्जन कर विवेक से उत्पन्न
बोध द्वारा मुझसे मारे जाते हो