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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 52

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

एतावन्तं चिरं कालं व्यर्थमालुठितोऽवटे । अहमत्र तृणोन्मुक्ते दुरद्रौ हरिणो यथा ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

अब अपनी पूर्वावस्था की अविचारदशा के लिए शोक करते हैं। जैसे तृण-हीन खराब पर्वत में हरिण दीर्घकाल तक व्यर्थ इधर-उधर लुढ़कता है वैसे ही मैं इस संसाररूपी गड्ढे में इतने दीर्घकाल तक वृथा लुढ़कता रहा