Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verses 60–61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verses 60–61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
वासनारहितं कर्म क्रियते ननु चित्त हे ।
केवलं नानुभूयन्ते सुखदुःखदृशोऽग्रगाः ॥ ६० ॥
तस्मान्मूर्खाणीन्द्रियाणि त्यक्त्वान्तर्वासनां निजाम् ।
कुरुध्वं कर्म हे सर्वं न दुःखं समवाप्स्यथ ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
मोह, भय, विषाद, चिन्ता, उद्वेग आदि सब संतापों की शान्ति ही इसका गुण है, यह भाव है