Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
रागद्वेषवतोर्नित्यमन्योन्यातिविरुद्धयोः ।
एतयोर्मूलकाषेण विनाशः परमं सुखम् ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे परस्पर एक-दूसरे के पोषक होने के कारण अनुरागवाले, परस्पर संतापक होने के
कारण द्वेषवाले बाघों के रहते वन के हिरण को सुख नहीं होता वैसे ही पूर्वोक्त रीति से परस्पर प्रबल
विरोध रखनेवाले इन दोंनों के (शरीर और मन के) रहते बेचारे जीव को सुख नहीं होता, किन्तु इनका
मूलअज्ञान के द्वारा विनाश ही परमसुख है