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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

तर्दुःखैस्तापितो देहो मनो हन्तुमथेच्छति । पुत्रोऽपि हन्ति पितरमाततायिपदं गतम् ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

मन में देह के द्वेषांश को उसके निमित्त के साथ दिखलाते हैं। तदनन्तर उन दुःखों से तापित शरीर मन को मारने की इच्छा करता है अर्थात्‌ दुर्विषयों के सेवन से मन में राग-द्वेष, शोक, मोह, पाप आदि के जनन द्वारा मन को पीड़ित करना चाहता है। मन से उत्पन्न हुआ अतएव मन का पुत्ररूप शरीर पितृ स्थानीय मन को कैसे मारना चाहता है, ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये, क्योकि आततायी बने हुए (पीड़ाप्रद) पिता को पुत्र भी मारता ही है