Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 55, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
उपशशाम शनैर्दिवसैरसौ कतिपयैः स्वपदे विमलात्मनि ।
तरुरसः शरदन्त इवामले रविकरौजसि जन्मदशातिगः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
“न तस्य प्राणा उत्क्रामन्त्यत्रैव समवनीयन्ते“ इस श्रुति में कहे गये प्रकार के अनुसार उन्हीं मे उनके
प्राणो का तप्त जल की उष्णता के समान क्रम से उपशमन हुआ, इस आशय से कहते है ।
धीरे-धीरे कुछ दिनों में वह उद्दालक ऋषि जिस प्रकार हेमन्त ऋतु में वृक्षों का रस निर्मल सूर्य
किरणों के तेज में शान्त हो जाता है उसी प्रकार जन्म-मरण से छुटकारा पाकर अपने प्राप्त करने
योग्यस्थान शुद्ध आत्मा में शान्त हो गये अर्थात् उद्दालक ने अपने प्राणों को स्वात्मा में लीन कर
दिया