Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 56, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
संवित्पुरुषशब्दार्थैः स कलङ्कैः कलंक्यते ।
अहंत्वंवासनारूपैः शुक्तिकारजतोपमैः ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञ जनों में किसको कलंक होता है यानी कौन कलंकी है, ऐसा प्रश्न होने पर उसका निर्देश
करते है ।
शास्त्रों द्वारा जिनकी अभ्यनुज्ञा (स्वीकृति) प्राप्त नहीं है, ऐसे विषयों के सेवन से दूषित वासनारूप
ऐन्द्रिक संवित्ु,उनके आयतन देह और उनके भोग्य शब्दार्थरूप विषयों से, जो शुक्ति रजत के समान
हैं, अहंकार प्रधान लिंगात्मा कलंकित होता है