Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 57, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
परमात्ममणेश्चित्त्वाद्यदन्तः कचनं स्वयम् ।
चेतनात्मपदे चान्तरहमित्यादि वेत्त्यसौ ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
परमात्मारूप मणि का चित् होने के कारण जो अन्दर
स्वयं स्फुरण होता है उसीकी चेतनारूप स्वरूप में वह “अहम्” इत्यादिरूप से कल्पना करता हे