Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 57, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
यथावर्तादितामेति द्रवत्वाद्वारि वारिणि ।
तदाहंतादितामेति ज्ञप्ता ज्ञप्तौ ज्ञ आत्मनि ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे द्रवस्वभाव होने के कारण
जल ही जल में आवर्त आदि भाव को प्राप्त होता है, वैसे ही मायावी सर्वज्ञ ही अपनी माया से संयुक्त
ज्ञप्तिरुप आत्मा में अहंतादिरूपको यानी जीव और जगत् के रूप को प्राप्त होता है