Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 58, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
विचारणा परिज्ञातस्वभावस्य सतस्तव ।
हर्षामर्षदशाश्चेतस्तोलयिष्यन्ति नाचलम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
मैं कौन हूँ ? कैसा हू ?, यह दिखाई देनेवाला जगत् क्या
है? कैसे जन्म ओर मरण होते है ?, इसका भी अन्दर से विचार कीजिये, यों विचारने से आप महत्ता को
(अविचार से भासनेवाली मिथ्या परिच्छिन्नता के निकल जाने के कारण अपरिच्छिन्नता को) अनायास
प्राप्त हो जायेंगे ॥ ३ २॥ जब तथोक्त विचार से अपने सत्स्वरूपभूत स्वभाव को आप जान जायेंगे, तब
आपके निश्चल मानस को हर्ष, अमर्षं आदि अवस्थाएँ उत्तोलन नहीं कर पायेगी अर्थात् उन्नमन ओर
आनमन के हेतु पदार्थो से तराजू की स्थिति जैसे अनियत (असंतुलित) हो जाती हे, वैसे आपके
अन्तःकरण की स्थिति अनियत नहीं होगी