Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 58, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
सकलकारणकार्यपरम्परामयजगद्गतवस्तुविजृम्भितम् ।
अलमपास्य मनः स्ववपुस्ततः परिविलाप्य यदेति तदेव तत् ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
मणियों में सूत की नाई सम्पूर्ण कार्य और
कारणों की परम्परारूप जगत् में अनुगत सद्रूप वस्तु में केवल अपनी कल्पना से अभिव्यक्त मिथ्याभूत
सद् से भिन्न वस्तुओं का निःशेष परित्याग कर, अनन्तर अपने (मन के) स्वरूप का भी मूलअज्ञान का
नाश होने से बाध-द्रारा प्रविलापन कर मन जिस सच्चिदानन्दैकमात्र वस्तु को प्राप्त होता है, वही पर
ब्रह्म का स्वरूप हे