Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 59, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 59, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
एवं त्यजामि संवेद्यं चेत्यं नाहं हि तत्किल ।
शेषो विकल्परहितो विशुद्धचिदहंस्थितः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी युक्ति से साक्षिसंवेद्य प्रमिति और प्रमेयको छोड़ता हूँ, क्योकि
चेत्य नहीं हूँ, यह निश्चित है। (इतने विचार के अनन्तर अब) इस निश्चय पर आरूढ हुआ कि समस्त
विकल्पों से शून्य, विशुद्ध साक्षीरूप शेष आत्मा मैं हूँ