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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 59, Verses 3–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 59, verses 3–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 3-7

संस्कृत श्लोक

नाहं मेरुर्न मे मेरुर्जगन्नाहं न मे जगत् । नाहं शैला न मे शैला धरा नाहं न मे धरा ॥ ३ ॥ किरातमण्डलं नेदं मम नाहं च मण्डलम् । निजसंकेतमात्रेण केवलं देश एव मे ॥ ४ ॥ त्यक्तो मयैष संकेतो नाहं देशो न वैष मे । इदानीं नगरं शिष्टमेष एवात्र निश्चयः ॥ ५ ॥ पताकावनपङ्क्त्याढ्या भृत्योपवनसंकुला । गजाश्वसामन्तयुता पुरी नाहं न मे पुरी ॥ ६ ॥ व्यर्थसंकेतसंबन्धं संकेतविगमे क्षतम् । भोगवृन्दं कलत्रं च नाहं नैतन्ममाखिलम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

राजा पहले बाह्य दृश्यों में आत्मता और आत्मीयता का विचार से निरास करते हैं। मैं न मेरु पर्वत हूँ और न मेरा मेरू पर्वत है, मैं जगत्‌ (ऊपर और नीचे के लोक) हूँ और न मेरा जगत्‌ है, मैं न पर्वत हूँ और न मेरे पर्वत हैं, मैं न पृथ्वी हूँ और न मेरी पृथ्वी है। मेरा न तो यह किरातमण्डल है और न मैं ही किरातमण्डल हूँ, केवल अपने संकेत से यानी सब लोगों की संमति से पट्टाभिषेक आदि के द्वारा मैं राजा बनाया गया हूँ, यों अपनी कल्पना से ही मेरा केवल देश ही है। मैंने यह कल्पना छोड़ दी, मैं न देश हूँ और न मेरा यह देश है, अब नगर बचा, पर इस नगर के विषय में भी कल्पना त्याग से यही निश्चय निकलता है-ध्वजाओं और बागोंकी पंक्तियों से युक्त सेवक और उद्यानों से भरी, हाथियों, अश्वों और सामन्तो से युक्त नगरी न तो मैं हूँ और न तो नगरी मेरी हे । मिथ्याभूत कल्पना से सम्बन्ध रखनेवाला तथा कल्पना का विनाश होने पर नष्ट हो जानेवाला यह भोग समुदाय तथा भार्या आदि कुटुम्ब परिवार मैं नहीं हूँ और न तो वह सब मेरा ही है