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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 6, Verses 16–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 6, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

तनोत्ययं विचारेण चारुणा शान्तचेतसा । प्रबोधनाय प्रथमं मनोमननमान्तरम् ॥ १६ ॥ ये हि पाश्चात्यजन्मानस्ते हि सुप्तं मनोमृगम् । प्रबोधयन्ति प्रथमं गुणहीनं महागुणाः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

यह विचार से सुन्दर तथा शान्तचित्त से पहले आभ्यन्तर मनोमनन को ज्ञान के लिए बढ़ाता है। जो अन्तिम जन्मवाले जीवन्मुक्त पुरुष हैं, वे महागुणी पुरुष सोये हुए मनरूपी मृग को ऐसे बोधित करते हैं, जैसे वह निर्गुण ब्रह्म ही हो जाता हे