Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 6, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 6, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
जातोऽसौ वृद्धिमभ्येति पार्वणश्चन्द्रमा इव ।
कुटजं प्रावृषीवैनं सौभाग्यमनुगच्छति ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
उसकी शान्ति आदि गुणो से अभिवृद्धि कहते है ।
उत्पन्न होकर वह पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान वृद्धि को प्राप्त होता हे । जैसे वर्षा ऋतु में कुटज के
वृक्ष को पुष्प शोभा प्राप्त होती है, वैसे ही उसे साधन चतुष्टय सम्पत्ति प्राप्त होती हे