Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 60, Verses 8–9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 60, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
सर्वं चित्तत्त्वकलनं जगदित्यवलोक्य सः ।
प्रशान्तसुखदुःखश्रीस्तस्य पूर्णा मतिर्बभौ ॥ ८ ॥
उल्लसन्विकसन्पूर्णस्तिष्ठन्गच्छन्विशन्स्वपन् ।
अभूत्समसमाधिस्थः प्रबुद्धश्चिल्लयं गतः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि यह सब जगत् केवल
चित्तत्व की कलना ही है, यों निश्चय करने के कारण उसकी बुद्धि भौतिक सुख-दुःखात्मक विकारों से
रहित अतएव परिपूर्णरूप से प्रकाशित हो रही थी, इसलिए प्रबुद्ध तथा चित् में लय को प्राप्त वह राजा
शरीर से उल्लसित होते, चित्त से विकसित होते, पूर्णरूप से अवस्थित रहते, जाते, बैठते ओर सोते
सदा सर्वदा पर ब्रह्म की समाधि में ही स्थित रहता था