Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 61, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 61, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
तपश्चरञ्छान्तमतिर्दान्तः कन्दरमन्दिरे ।
स्वयं शीर्णानि शुष्काणि तत्र पर्णान्यभक्षयत् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसकी बुद्धि शान्त हो चुकी थी तथा
जिसने अपना दमन किया था, ऐसा पर्वत के गुहा मन्दिर में तपश्चर्या कर रहा वह राजा परिघ वहाँ स्वयं
शुष्क और जीर्ण-शीर्ण पत्तों का भक्षण करता था । (यहाँ कन्दरमन्दिरे“ इस शब्द से उसकी अत्यन्त
विरक्ति सूचित होती है, क्योकि उसने पर्णकृटी का भी परित्याग कर केवल पर्वत की गुफा का आश्रय
लिया था)