Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 62, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथैवंप्रायया तत्र विश्रम्भकथया चिरम् ।
प्राक्तनस्नेहगर्भिण्या स्थित्वोवाचायुधाभिधः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
महर्षि श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, तदनन्तर चिरकाल तक करीब करीब उस तरह की प्राचीन
प्रेम से ओतप्रोत विश्वासपूर्ण कथालापा से सुरघु के सुन्दर सदन में विश्रान्ति लेकर राजा परिघ, जिसका
श्त्रविशेष का नाम के सदृश नाम है, कहने लगे
सर्ग सन्दर्भ
इकसठवाँ सर्ग समाप्त बासठवाँ सर्ग अज्ञानरूपी आवरण के हट जाने पर नित्यचित्-स्फुरण की अवस्था से विद्वानों की सदा सर्वदा अद्वितीय ब्रह्म में ही समाधि होती है, यह वर्णन ।