Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 62, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
गतिं कालकला यद्वच्चिन्वाना समवस्थिता ।
चिच्चितिश्चेत्यरहिता चिन्वाना गतयस्तथा ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसका आवरण विनष्ट हो चुका है, ऐसा आत्मा स्वाकारवृत्तियो को लगातार उत्पन्न करता ही
स्थित रहता है, इस आशय से कहते है।
जैसे काल के मूर्तिरूप सूर्य आदि अपनी गति को बटोरते हुए (निरन्तर गति सम्पन्न होते हुए) ही
सदा स्थित रहते है, वैसे ही विषयों से विनिर्मुक्त (अनावृत) चैतन्य स्फूर्ति भी अपनी गतियो को यानी
स्वाकार वृत्तियों को बटोरती हुई (निरन्तर आत्माकार-वृत्तियों से सम्पन्न होती हुई) ही रहती हे