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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verse 55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 64, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

तदनु विषयवासनाविनाशस्तदनु शुभः परमः स्फुटप्रकाशः । तदनु च समतावशात्स्वरूपे परिणमनं महतामचिन्त्यरूपम् ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

उस प्रकार चतुर्थ भूमिका में आत्मा का अनुभव होने के अनन्तर पाँचवी भूमिका में विषयवासनाओं का आत्यन्तिक विनाश हो जाता है, उसके बाद छठी भूमिका में किसी तरह के प्रयत्न के बिना ही शुभ परम पुरुषार्थरूप अपने आत्मा का स्फुट प्रकाश यानी सदा ही पूर्णता का अनुभव सिद्ध होता है। उसके बाद सातवीं भूमिका में समाधि और असमाधि की समता के कारण विषमता का अत्यन्त निरास हो जाने से, समुद्र के भीतर विलीन नमक के समान स्व-स्वरूप में सुखैकरसता स्वरूप से परिणमन होता है अर्थात्‌ अपने में ही परमात्मभाव हो जाने से स्वरूपनिष्ठा सिद्ध हो जाती है। इस परिणमन के तत्त्व का ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े देवता भी इयत्तारूप से परिज्ञान नहीं कर सकते, क्योकि “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह" इत्यादि श्रुतियाँ है, यह भाव है