Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 66, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अतिशोकपराभूतौ तस्थतुर्दृढतापसौ ।
तापसंशुष्कसर्वाङ्गौ तावरण्यद्रुमाविव ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
महामुनि श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, ग्रीष्म के प्रचण्ड ताप से तथा दावाग्नि के ताप से सर्वागीण
सूखे हुए अरण्य में उत्पन्न दो वृक्षों के समान अत्यन्त शोक से पराजित पिता के वियोगजन्य संताप से
सर्वागीण सूखे हुए वे दोनों दृढ तपस्वी अवस्थित थे
सर्ग सन्दर्भ
पैंसठवाँ सर्ग समाप्त छासठवाँ सर्ग तत्त्वज्ञान से रहित भास के वचनों से उसके दुःखसागर में पर्यावर्तन का विस्तारपूर्वक वर्णन ।