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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, Verses 36–37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 66, verses 36–37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

अयं सुहृदयं शत्रुरिति द्वन्द्वमहाद्विपः । विनिकृन्तति मर्माणि यथा नीलोत्पलानि मे ॥ ३६ ॥ चिन्तानद्या महावर्ते वीचिकानिचये चिरम् । क्षणादुच्छूनतामेति मनोमीनः क्षणाद्गतिः ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

मित्र, जैसे मत्त हाथी नील कमलों का उच्छेदन कर देता, वैसे ही यह मेरा मित्र है, यह मेरा शत्रु है, इस प्रकार के द्वन्द्वरूपी मदोन्मत्त हाथी मेरे मर्मस्थानों का भेदन कर रहा है