Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 68, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
संसक्तिवशतो वाति वायुर्भुवनकोटरे ।
पञ्चभूतानि तिष्ठन्ति वहतीयं जगत्स्थितिः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
अहन्ताध्यास से युक्त मन, काम आदि वृत्तियों की
असंख्यता के कारण, अनन्त शाखा-प्रशाखाओं से युक्त वृक्ष के सदृश कहा जाता है और अहन्ताध्यास
से वर्जित मन विलीन चित्त कहा जाता है