Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 68, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
मुक्तालताया गङ्गाया मेरोरापादमस्तकम् ।
तरङ्गमुक्ता गण्यन्ते न देहाः सक्तचेतसाम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
आसक्ति का त्याग करने से ही सभी जीवन्मुक्त पुरुष के गुण मन में सिद्ध हो जाते है, इस आशय
से कहते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी, जो अन्तःकरण भीतरी आसक्तियों से शून्य होगा, वह न कर्ता होगा, न बद्ध होगा,
न अयुक्त होगा ओर न लिप्त होगा अर्थात् अकर्ता, विमुक्त, प्रशान्त, युक्त ओर अलिप्त ही होगा