Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 72, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
यथा चरन्ति विविधैर्मणिरत्नैर्महोर्मयः ।
निरस्तवासनाश्चित्तव्यवहारैस्तथोत्तमाः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि देह का आत्मा के साथ सम्बन्ध नहीं है, तब देह में क्रिया आदि कैसे हो सकते हैं,
क्योकि आत्मसम्बन्ध से शून्य मृत देह में क्रिया आदि देखने में नहीं आते, तो इस पर कहते हैं।
श्रीरामजी, प्राणवायु से अथवा प्राण स्थिति के प्रयोजक अन्न आदि भूतो से प्राप्त बल होकर ही
देह स्पन्दन को प्राप्त करती है, इसलिए आत्मा के साथ देह का स्वल्प भी सम्बन्ध नहीं है। तात्पर्य यह
निकला कि देहगत स्पन्द में प्राण अथवा बल ही प्रयोजक है, आत्मा नहीं